Monday, July 27, 2020

‘सेवा वह चंदन जो महकाता है, इसके बिना जीवन नकली फूल की तरह है’

सेवा मनुष्य जीवन की सुगंध है और ऐसी सुगंध जिससे सब मोहित व आकर्षित हो जाते हैं। बिना सेवा के मनुष्य का जीवन नकली फूल की तरह है जिसमें सौंदर्य तो है पर सुगंध नहीं। सार्थक और सफल जीवन वही है जो मन से करुणावान हो और तन से सेवा समर्पित। तन का मोह छोड़े बिना व्यक्ति का मन सेवा में रमण नहीं करता, सेवा में प्रेम और करुणा का साकार रूप है। सेवा तभी साधना बनती है जब उसके साथ कोई कामना ना जुड़े। कामना स्वार्थ से पैदा होती है और स्वार्थ सेवा को निष्काम नहीं रहने देती। जितने भी सेवानिष्ठ हुए है, उन्होंने न नाम की, ना पद की और ना सम्मान की कामना की, इन सारी कामनाओं से ऊपर उठकर वे सेवा को अपना धर्म मानकर जीये, इसी से सेवा ने उनको परम पद की प्रतिष्ठा दी।
यह बात शास्त्री काॅलोनी स्थित नवकार भवन में विराजित जैनाचार्य विजयराज महाराज ने रविवार को अपने मंगल संदेश में प्रसारित कहीं। उन्होंने कहा कि निःस्वार्थ भाव से किसी की आवश्यकता की पूर्ति
करना, अपेक्षित सहयोग प्राप्त करना सेवा है। सेवा में व्यक्ति तेरा-मेरा, अपना-पराये का भाव नहीं रखता इसलिए सेवा उसके लिए धर्म बन जाती है। सेवा धर्म है, पुण्य है, मानवता का शृंगार है, इससे प्राणी मात्र उपकृत होता है। उपकार का पुरस्कार साधारण नहीं होता, दीवारों पर लिखा नाम तो एक दिन मिट जाता है मगर जिनके दिलों पर उपकारक का नाम लिखा होता है वह कभी नहीं मिटता।
सेवा की स्याही से लिखा नाम अमिट होता है। सेवा वास्तव में चंदन की छड़ी है जिसे देने और लेने वाले के हाथों में प्रभु नाम की महक फैल जाती है।
आचार्यश्री ने कहा कि सेवा का मतलब सर्विस नहीं है, सर्विस में सर्वेंट को लालच होता है, उसे अधिक पैसा दो तो वह अच्छी सर्विस देता है। मगर सेवा तो पूरा जीवन दर्शन है। सेवा करने वाला यह सोचता है - मैंने किसी की सेवा करके ईश्वरीय आज्ञा का पालन किया है। ईश्वरीय आज्ञा में समर्पित रहने वाला कभी भी सेवा को भार नहीं समझता वह तो उपहार मानकर सेवा करता है। इसलिए उसमें घृणा, तिरस्कार या उपेक्षा का भाव पैदा नहीं होता। सेवा करने वाले हाथ स्तुति करने वाले हाथों से ज्यादा पवित्र होते हैं। हर मानव
को अपने जीवन में निःस्वार्थ और निष्काम सेवा को अपना आदर्श मानना चाहिए। सेवा केवल तन से ही नहीं होती उसमें मन की भूमिका महत्वपूर्ण होती हैै। मन में उदारता और विशालता है तो सेवा बहुत आसान हो जाती है। कोरोना संकटकाल में हर मानव को दूसरों की सेवा में समर्पित रहना चाहिए। तन से सेवा न कर सके तो मन से सद्भावना रखकर भी सेवा करके अपना पुण्य बढ़ाना चाहिए।



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