धरमपुरी के पास स्थित स्वयं-भू भगवान बिल्वामृतेश्वर महादेव का प्राचीन मंदिर है। इसके परिसर में ही महर्षि दधिचि की समाधि स्थित है। महर्षि ने विश्व कल्याणार्थ अपनी अस्थियां व्रज के लिए दान की थीं। इसे बेंट टापू के नाम से जानते हैं। इस टापू के बारे में कहा जाता है कि यह मां रेवा का कटि स्थान है। इसका उल्लेख रेवा महात्म में मिलता है। मंदिर पुजारी पं. वीरेंद्र व्यास बताते हैं कि टापू को रेवा का गर्भ स्थान माना जाता है।
नर्मदा से घिरे इस पौराणिक टापू की लंबाई पौराणिक समय में 13 किलोमीटर थी। जो पूर्व में ग्राम पिपल्दागढ़ी और पश्चिम में ग्राम हतनावर तक था। शासन की उपेक्षा के कारण चारों ओर नदी के तेज बाहव के कारण वर्तमान में ढाई से तीन किलोमीटर ही शेष बचा है। कटाव इतना तेजी से हो रहा है टापू पर स्थित मुख्य मंदिर व धार स्टेट द्वारा निर्मित धर्मशाला से पश्चिम की ओर नर्मदा 30 फीट, उत्तर की ओर से 15 फीट दूर है।
बिल्वामृतेश्वर महादेव के प्राचीन मंदिर में महाशिवरात्रि पर्व पर भगवान की शाही सवारी एक दिन पहले निकाली जाती है। शिवरात्र पर एक दिनी मेला भी लगाता है। यहां करीब दाे लाख श्रद्धालु पहुंचते हैं। यह जिले का सबसे बड़ा आयाेजन माना जाता है।
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